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आज मै मजहब से मजहब की जंग देखता हूँ,

जब से मेरा मुफलिसी से रिश्ता हो गया है,
क्यों तब से सब अपनों को मै तंग देखता हूँ,

मै भी बहुत जलता हूँ बेबस चिरागों की तरह,
जब हँसता हुआ उसे गैरों के संग देखता हूँ,

रात भर छाया रहा मुझपे जिस हुस्न का सुरूर,
होश में आने पे उसे बहुत बदरंग देखता हूँ,

रात की रंगीनियो में सजती है जो गंदी गलियां,
सुबह उन बदनाम गलियों को मै बेरंग देखता हूँ,

सब मुश्किलातों से भी निराश नही हुआ है "मन"
आज भी खुद में जीने की कुछ उमंग देखता हूँ...
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